Thursday, April 17, 2008

नज़्म

नज़्म
 
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे!
 
अक्सर तुझको देखा है के ताना बुनते,
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ तो,
बाँध के उसमें और सिरा कोई जोड़ के उसको
आगे बुनने लगते हो!
 
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिरह-गुन्तर की
देख नहीं सकता है कोई,
 
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता,

लेकिन उसकी सारी गांठें
अब तक साफ नज़र आती है मेरे यार जुलाहे,
 
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे!

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