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Wednesday, March 2, 2011

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

समर्पण

समर्पण

भूखे जन को अन्न दान दो......प्यासे को जल का दान
वस्त्रहीन को वस्त्र दान दो........मानहीन को सच्चा मान 
भय -विकल को शान्ति दान दो.....शरण हीन को आश्रय -दान 
शोक -विकल को शान्ति दान दो.......आतुर जन को सेवा -दान
दुःख पतित को धैर्य दान दो......रोगी जन को औषध दान
पथ भूले को मार्ग दान दो........दो निराशा को आशा दान
ज्ञानहीन को ज्ञान दान दो...........संशयालु को श्रध्हा दान
धर्महीन को धर्म दान दो..........नास्तिक को इश्वर का ज्ञान 

जो,जिसको ,जब आवश्यक हो,करो तभी उसको वह दान!!
जो तुम कर सकते हो करो,पर मत कभी उस पर अहसान !!
मत समझो दाता अपने को, करो न कभी भी तुम अभिमान !!!
सविनय करो समर्पण प्रभु को,प्रभु की वस्तु सहित सम्मान !!!!

Friday, August 28, 2009

कबीर के अनमोल बोल





कबीर के अनमोल बोल

सो ब्राह्मण जो कहे ब्रहमगियान,
काजी से जाने रहमान
कहा कबीर कछु आन न कीजै,
राम नाम जपि लाहा लीजै।
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चलती चक्की देख के कबीर दिया रोय।
दो पाटन के बीच में साबूत बचा न कोय।।

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पोथी पढ़ी- पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोई।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

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प्रेम न खेती उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देहि ले जाय।

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जल में कुंभ कुंभ में जल है बाहरि भीतरि पानी।
फुटा कुंभ जल जलाहि समाना यहुतत कघैं गियानी।

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गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहू आकार।
आपा भेट जीवत मरै, तौ पावै करतार।।












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